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स्त्री की स्वतंत्रता और अधिकारों के संघर्ष को मंच पर उठाता कुच्ची का कानून।

स्त्री की स्वतंत्रता और अधिकारों के संघर्ष को मंच पर उठाता कुच्ची का कानून।

मेरे शरीर पर मेरा हक है तो मेरे कोख पर किसी और अधिकार कैसे।
प्रवीण स्मृति नाट्य महोत्सव के दूसरे दिन भी हुई विज्येंद्र टॉक के निर्देशन में प्रस्तुति।
नुक्कड़ नाटक खुच्चड़ का भी हुआ मंचन
पटना।
मंच पर कहानी की नायिका कहती है मेरा कहना है कि कोख देकर ब्रम्हा ने औरतों को फंसा दिया। अपनी बला उनके सिर डाल दी। जब मेरे हाथ-पैर, आंख, कान पर मेरा हक़ है, इनपर मेरी मर्जी चलती है, तो मेरी कोख पर किसका हक होगा? उसपर किसकी मर्जी चलेगी? कुछ ऐसे ही सवालों के साथ महिलाओं की स्वतंत्रता और हक के हनन के खिलाफ पुरुषप्रधान समाज की सत्ता को चुनौती देती एक आवाज उठाती है कुच्ची। जो भारतीय समाज प्राचीन काल से ही पुरुषसत्तात्मक मानसिकता का अनुयायी रहा है। जिसमें महिलाओं की स्वतंत्रता उनकी अभिव्यक्ति और संवेदना को कोई खास महत्व नहीं दिया जाता रहा है। उन्हें मात्र एक वस्तु के रूप में प्रयोग करने की सामग्री समझा गया है। कुच्ची विधवा होते हुए भी बिना दूसरा विवाह किए गर्भ धारण करती है, जो समाज के पुरुष मानसिकता को नागवार गुजरती है। प्राचीन काल से बस इसी मानसिकता के डर से कई बच्चे मारे जाते रहे हैं गिराए जाते रहे हैं जिन्हें समाज नाजायज समझता है। वहीं कुच्ची अपने बच्चे को पैदा करने के लिए अपनी पूरी सकारात्मक ऊर्जा से सारे समाज के सामने खड़ी हो जाती है और कहती है सीता की माई डर गई, अंजनी माई डर गई पर बालकिशन की माई नहीं डरने वाली। मेरा बालकिशन पैदा होकर रहेगा लेकिन क्या किसी एक महिला की हिम्मत से पितृसत्तात्मक मानसिकता में बदलाव आ सकता है? ऐसी ही संभावनाओं व विमर्श की तलाश करता नाटक कुच्ची का कानून। राजधानी पटना के प्रेमचंद रंगशाला में मंगलवार को चार दिवसीय प्रवीण स्मृति नाट्य महोत्सव के दूसरे दिन नुक्कड़ नाटक खुच्चड़ एवं मंच प्रस्तुति में विज्येंद्र टॉक निर्देशित कुच्ची का कानून की शानदार प्रस्तुति की गयी। ये प्रस्तुति शिवमूर्ति लिखित कहानी थी। जिसका नाट्य रुपांतरण अविजित चक्रवर्ती ने किया था। शिवमूर्ति की कहानियों का जितना साहित्यिक महत्त्व है, उतना ही समाजशास्त्रीय भी। उन्हें गांव की सकारात्मक पक्ष और नकारात्मक के क्रम में धीरे-धीरे अर्जित किया गया। यथार्थ की इस समृद्धि की ओर ध्यान तब जाता है। जब हम देखते हैं कि शिवमूर्ति गांव और उनमें बसे मनुष्यों को गहन आत्मीयता देने के बावजूद इस परिवेश में व्याप्त संकट, दुख, विषमता और विसंगति को दृष्टि-ओझल नहीं होने देते। वे वहां व्याप्त आत्मविनाशी प्रवृत्तियों और लोकाचार के कारकों की शिनाख्त करते हुए उन पर प्रहार करते हैं। इस तरह शिवमूर्ति की कहानियां ग्रामीण समाज के जातिवाद, राजनीतिक क्षरण, धर्मभीरुता, स्त्री-दमन और ताक़त की हिंसा का प्रतिपक्ष बनती हैं। इस प्रस्तुति को मंच पर कलाकारों ने जीवंत बनाया। निर्देशकीय पक्ष नाटक की हर पहलू को उभारने में कामयाब रहा।
मंच पर
कुच्ची – शाइस्ता खान
रमेसर भगत – मो. जफर आलम
रमेसर बहु – श्रीपर्णा
हनुमान – मनीष महिवाल
अइया – हेमा चौधरी
बनवारी – मृत्युंजय प्रसाद
सुलक्षिणी – बिनीता सिंह
बलई बाबा – राहुल रंजन
धनई बाबा – स्पर्श मिश्रा
लक्ष्मण चौधरी – रोहित चंद्रा
सुधरा ठकुराइन – अपराजिता मिश्रा
बितानु – अभिषेक राज
कुट्टी – अपराजिता मिश्रा
दलाल – कुमार उदय सिंह
ग्रामीण – पंकज , प्रतिमा, अजीत, अभिमन्यु

मंच परे
प्रकाश – विनय कुमार
सहयोग – लाल बाबु
रूप सज्जा – जितेन्द्र जीतू
सहयोग – राहुल रंजन
मंच निर्माण- सुनील विश्वकर्मा
संगीत संयोजन – रोहित चन्द्रा
साउंड इफेक्ट – अभिषेक राज
सारंगी – अनिश मिश्रा
वस्त्र – राखी लोहिया
कहानी – शिवमूर्ति
नाट्य रूपांतरण – अविजित चक्रवर्ती
सहायक निर्देशक- शाइस्ता खान
निर्देशक – विज्येन्द्र कुमार टॉक बिरजु

  1. मंच प्रस्तति से पूर्व प्रेमचंद रंगशाला परिसर में शाम को नुक्कड़ नाटक खुच्चड़ का प्रदर्शन किया गया। नाटक खुच्चड़ की कहानी कचहरी में काम करने वाले मुंशी कुंदनला,ल उनकी पत्नी रामेश्वरी और उनके के जीवन शैली एवं कार्यशैली के इर्द-गीर्द घुमती है। यह एक पारिवारिक हास्य-व्यंग नाटक था। नाटक के पात्रों में मुंशी जी- धर्मेश मेहता, बाबूलाल- राकेश कुमार, रामेश्वरी- गुड्डी कुमारी, शर्मा जी- सौरभ सिंह, पाठक जी- रंधीर सिंह, पाण्डे जी- गौतम कुमार निराला, काजी साहब- मोहम्मद् सदरुद्दीन, ठेला वाला- मनोज मयंक, सागवाली- मीना देवी, काजल कुमारी, साधु- कंचन वर्मा, मनोज मयंक, डांस- काजल कुमारी। कहानीकार -मुंशी प्रेमचंद नाटय रुपांतरण व निर्देशन- धर्मेश मेहता।
  2. https://youtube.com/shorts/IzdCVHU09pQ?feature=share

 

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Author: pnews

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