“बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: बेटे की मौत के बाद 84 वर्षीय मां को सरकारी पेंशन का हक”
पहली पत्नी से तलाक, दूसरी की मौत, फिर बेटे का निधन: बॉम्बे हाई कोर्ट ने मां को दिया पेंशन का अधिकार
मुंबई: महाराष्ट्र की 84 वर्षीय इंदुवाई बागुल ने अपने बेटे को खो दिया और पूरी तरह आर्थिक रूप से असहाय हो गईं। उनके बेटे दिलीप बागुल, जो पालघर जिला परिषद में सरकारी नौकरी में थे, का 2017 में हार्ट अटैक से निधन हो गया। बेटे के निधन के बाद इंदुवाई ने उसकी पेंशन के लिए आवेदन किया, लेकिन प्रशासन ने पेंशन देने से इनकार कर दिया।
मामला
दिलीप की पहली पत्नी से तलाक हो चुका था और दूसरी पत्नी का भी 2017 में निधन हो गया था। बेटे के कोई वारिस नहीं थे, इसलिए पेंशन का दावा केवल उसकी मां के पास ही बचा था। प्रशासन ने उनके आवेदन को खारिज कर दिया, जिससे उन्हें बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
कोर्ट का फैसला
बॉम्बे हाई कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस रविंद्र घुघे और जस्टिस अभय मंत्री शामिल थे, ने सुनवाई के बाद स्पष्ट किया कि मृत सरकारी कर्मचारी के माता-पिता (सिंगल पेरेंट्स) भी पेंशन पाने के पात्र हैं, यदि वे पूरी तरह से मृत कर्मचारी पर आश्रित हों।
कोर्ट ने जिला परिषद को निर्देश दिया कि बागुल को उनके बेटे की सेवानिवृत्ति से जुड़े सभी लाभ और ब्याज के साथ मिले। इसके लिए जिला परिषद को प्रस्ताव अकाउंटेंट जनरल को 30 दिन में भेजना होगा और अकाउंटेंट जनरल को एक महीने के भीतर निर्णय लेना होगा।
प्रशासन की बेरुखी और कानून
मामले में 22 जनवरी, 2015 के शासनादेश को आधार बनाया गया, जिसमें सरकारी कर्मचारी के सिंगल पैरेंट्स के लिए पेंशन का प्रावधान है। कोर्ट ने अपने निर्णय में इस आदेश और पुराने फैसलों का हवाला देते हुए बुजुर्ग मां को राहत दी।
निष्कर्ष:
यह फैसला उन माता-पिताओं के लिए मिसाल है जो अपने सरकारी कर्मचारी बच्चों के निधन के बाद आर्थिक रूप से असहाय हो जाते हैं।






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