बिहार में शराबबंदी के बावजूद अवैध शराब और नशे की बढ़ती चुनौती, दोहरी मार झेल रहा समाज
पटना/बिहार।
बिहार में पूर्ण शराबबंदी कानून लागू होने के कई वर्ष बाद भी राज्य में अवैध शराब की बिक्री पूरी तरह थम नहीं पाई है। एक ओर प्रशासन लगातार छापेमारी, गिरफ्तारी और सख्त कार्रवाई कर रहा है, वहीं दूसरी ओर तस्करी और गुप्त बिक्री के मामले समय-समय पर सामने आते रहते हैं। इस स्थिति ने न केवल कानून-व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भी गंभीर असर डाला है।
प्रशासन के सामने बढ़ती मुश्किलें
अवैध शराब के कारोबार को रोकना प्रशासन के लिए लगातार कठिन होता जा रहा है। सीमावर्ती इलाकों से तस्करी, गुप्त भंडारण और स्थानीय स्तर पर अवैध निर्माण जैसी गतिविधियाँ कानून लागू करने वाली एजेंसियों के लिए चुनौती बनी हुई हैं।
बार-बार की कार्रवाई के बावजूद इस धंधे का पूरी तरह खत्म न होना यह संकेत देता है कि समस्या केवल कानून से नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक कारणों से भी जुड़ी हुई है।
राज्य सरकार को आर्थिक नुकसान
शराबबंदी लागू होने के बाद राज्य को वैध शराब बिक्री से मिलने वाला राजस्व बंद हो गया। इसके विपरीत अवैध कारोबार से न तो सरकार को कोई आय होती है और न ही उस पर पूर्ण नियंत्रण संभव हो पाता है।
इस तरह एक तरफ राजस्व का नुकसान और दूसरी तरफ अवैध नेटवर्क पर नियंत्रण की बढ़ती लागत—दोनों मिलकर राज्य की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाते हैं।
बच्चों में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति, सबसे चिंताजनक पहलू
स्थिति का सबसे गंभीर पहलू यह है कि अब नशे का असर केवल वयस्कों तक सीमित नहीं रहा। कई स्थानों पर छोटे-छोटे बच्चों और किशोरों के स्पाइक पाउडर जैसे खतरनाक नशे की चपेट में आने की खबरें सामने आ रही हैं।
यह प्रवृत्ति समाज के लिए बेहद चिंताजनक है, क्योंकि इससे
बच्चों का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है,
पढ़ाई छूट रही है,
और उनका भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते रोकथाम, परामर्श और पुनर्वास की ठोस व्यवस्था नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या सामाजिक संकट का रूप ले सकती है।
सामाजिक जागरूकता और समन्वित नीति की जरूरत
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि केवल सख्त कानून पर्याप्त नहीं होता।
जरूरत है—
नशा मुक्ति अभियान को मजबूत करने की,
स्कूल स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाने की,
गरीब और जोखिमग्रस्त परिवारों के बच्चों के लिए विशेष सहायता योजनाएँ बनाने की,
तथा प्रशासन, समाज और अभिभावकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की।
आगे की राह
बिहार में शराबबंदी का उद्देश्य सामाजिक सुधार और पारिवारिक सुरक्षा सुनिश्चित करना था। लेकिन वर्तमान परिस्थितियाँ संकेत देती हैं कि नीति के साथ-साथ कार्यान्वयन, जागरूकता और पुनर्वास पर समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है।
यदि अवैध शराब और बाल नशे की समस्या पर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह राज्य की नई पीढ़ी और समग्र सामाजिक संरचना के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
निष्कर्ष:
बिहार आज दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है—एक ओर अवैध शराब का फैलता नेटवर्क और दूसरी ओर बच्चों में बढ़ता नशा। ऐसे में सरकार, प्रशासन और समाज—सभी को मिलकर ठोस, संवेदनशील और दीर्घकालिक समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे, तभी राज्य और उसकी नई पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित हो सकेगा।






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