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March 16, 2026 11:29 am

12 साल से बेहोश बेटे को दी इच्छा मृत्यु! हरीश राणा की दर्दनाक कहानी | Mother Emotional Story

पहली इच्छामृत्यु: साढ़े 12 साल से कोमा में पड़े बेटे को परिवार ने दी विदाई
हरीश राणा का घर इन दिनों पूरे देश की नजर में है। जब परिवार ने साढ़े 12 साल से कोमा में पड़े बेटे के लिए इच्छा मृत्यु का कठिन फैसला लिया, तो यह खबर देशभर में चर्चा का विषय बन गई।
मां की उम्मीद: शायद एक दिन पलक झपकाकर जवाब दे दे
हरीश राणा की मां निर्मला राणा बताती हैं कि वह रोज अपने बेटे से घर की हर बात करती थीं। उन्हें उम्मीद रहती थी कि शायद एक दिन वह पलक झपकाकर बता देगा कि उसने सब सुन लिया। कई बार जब उसके चेहरे पर हल्की हरकत दिखती, तो परिवार को लगता कि वह उनकी बात समझ रहा है।
2013 की दुर्घटना ने बदल दी जिंदगी
बताया जाता है कि 2013 में रक्षा बंधन के दिन हरीश राणा चंडीगढ़ में चार मंजिल से गिर गए थे। इसके बाद उन्हें गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया। पहले Postgraduate Institute of Medical Education and Research (PGI) चंडीगढ़ में इलाज चला और बाद में All India Institute of Medical Sciences (AIIMS) दिल्ली में वेंटिलेटर पर रखा गया।
इसके बाद भी कई अस्पतालों में इलाज कराया गया, लेकिन डॉक्टरों ने बताया कि उनकी हालत लाइलाज हो चुकी है।
43 लाख रुपये खर्च, घर तक बेचना पड़ा
हरीश के इलाज के लिए परिवार ने करीब 43 लाख रुपये खर्च कर दिए। इतना ही नहीं, इलाज के दौरान परिवार को अपना दिल्ली का घर भी बेचना पड़ा। कोरोना के समय परिवार हिमाचल प्रदेश के गांव चला गया और बाद में गाजियाबाद में एक फ्लैट लेकर रहने लगा।
छोटे भाई ने संभाली सेवा की जिम्मेदारी
हरीश के छोटे भाई आशीष राणा ने बताया कि दुर्घटना के समय वह बारहवीं कक्षा में थे। उसके बाद से वह और उनकी मां मिलकर रोज हरीश की देखभाल करते थे।
सुबह चार बजे उठकर उन्हें व्हीलचेयर पर बैठाना, स्पंज करना, मालिश करना और फिजियोथेरेपी कराना उनकी रोज की दिनचर्या बन गई थी।
पिता ने कहा – भगवान की गोद में छोड़ रहे हैं
हरीश के पिता अशोक राणा कहते हैं कि इतने वर्षों तक बेटे की सेवा करने के बाद अब यह फैसला लेना बेहद कठिन था। उन्होंने कहा कि वे अपने बेटे को भगवान की गोद में छोड़ रहे हैं ताकि उसे इस पीड़ा से मुक्ति मिल सके।
कोर्ट की मंजूरी के बाद लिया गया फैसला
परिवार ने इच्छा मृत्यु के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। पहले हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन बाद में Supreme Court of India से अनुमति मिलने के बाद यह फैसला संभव हो पाया।
यह मामला देश में इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia) पर चल रही बहस को फिर से चर्चा में ले आया है। हरीश राणा की कहानी एक ऐसे परिवार की पीड़ा को दिखाती है जिसने वर्षों तक उम्मीद के साथ अपने बेटे की सेवा की।

K k sanjay
Author: K k sanjay

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