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March 13, 2026 6:19 am

मां दुर्गा की पूजा के लिए इस मंदिर में 15-20 साल पहले लगता है

मां दुर्गा की पूजा के लिए इस मंदिर में 15-20 साल पहले लगता है

बिहार देश के उन राज्यों में शामिल है, जहां सिर्फ ऐतिहासिक धरोहर ही नहीं बल्कि अनोखी धार्मिक परंपराओं के लिए भी देश दुनिया पहचानी जाती है. नवादा जिले के पकरीबरावां प्रखंड अंतर्गत धमौल थाना क्षेत्र के रेवार गांव स्थित के दुर्गा मंदिर में नवरात्र के अवसर पर भक्तों भारी भीड़ उमड़ती है. यहां की सबसे खास बात यह है कि नवरात्रि के मौके पर मूर्ति बनवाने कर पूजन के लिए भक्तों को मनोकामना पूर्ण होने पर नंबर लगाते हैं.

पूजा के लिए लगता है नंबर: दरअसल, मूर्ति निर्माण के लिए लोग 15 से 20 साल तक का इंतजार करने के लिए तैयार हैं. इस गांव के देवी मंदिर में एक अनोखी परंपरा 1990 से निभाई जा रही है. देवी मां से मांगी गई हर तरह की मुराद पूरी हो जाती है तो श्रद्धालु मूर्ति निर्माण के लिए अपना नंबर लगाते हैं. नवरात्र के अष्टमी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमा मिट्टी से बनाकर दो दिनों तक धूमधाम से पूजा-अर्चना की जाती है.
प्रतिमा के ढांचे की होती है पूजा: 9वीं के दिन श्रद्धालुओं द्वारा 6 से 7 सौ खस्सी (बकरे) की बलि भी दी जाती है. उसके बाद विजयादशमी के दिन उनके तालाब में प्रतिमा को विसर्जित कर उसके ढांचे को दुर्गा मंदिर में रख दिया जाता है. जिसके बाद पूरे साल वहां भक्तों द्वारा उसी ढांचे की पूजा-अर्चना करते हैं. एकादशी के दिन ग्रामीण, मंदिर के पुजारी और कमिटी के सदस्यों की मीटिंग की जाती है. वहीं, तय होता है कि किस श्रद्धालु द्वारा बोली लगेगी और उनका नंबर कब आएगा?
मंदिर में रहकर आराधना करते हैं श्रद्धालु: यहां बिहार के अलावा झारखंड, ओडिशा, बंगाल, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पुणे और कर्नाटक तक से श्रद्धालु मंदिर में ही 9 दिनों तक रहकर आराधना करते हैं. उसके बाद वापस अपने घर लौटते हैं. यहां नवरात्र के दौरान भव्य मेले का भी आयोजन किया जाता है. पहले इसके लिए लाख से डेढ़ लाख रुपए खर्च होते थे. अब महंगाई बढ़ जाने से 5 लाख रुपये खर्च होता है. जिसका सारा खर्च नंबर आने वाले व्यक्ति ही उठाते हैं.
रेवार गांव के जमींदार हर्षहाय लाल ने औलाद नहीं होने पर 9 बिगहा जमीन साल 1923 में दान कर दी थी. उसके बाद गांव के ही परमेश्वर दयाल नामक व्यक्ति में उस स्थान पर झोपड़ी नुमा मंदिर में मां दुर्गा की पूजा शुरू हुई, तब से यह सिलसिला चला आ रहा है. इन्होंने ही श्रद्धालुओं की भक्ति को देखते हुए नंबर लगाने से शुरु किया था. अभी 2045 तक के लिए बुकिंग हो चुकी है.
जहां तक मुझे याद है कि 1990 से नंबर का सिस्टम शुरू हुआ है. अभी 2045 तक बुकिंग हो चुका है. इस वर्ष जो भी भक्त नंबर के लिए आए हैं, उनको 2046 या उसके बाद का नंबर मिलेगा.”- मुकेश कुमार सिन्हा, सदस्य, पूजा समिति, दुर्गा मंदिर

10 दिनों तक लगता है मेला: यहां मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने की शुरुआत कर्मा पूजा से शुरू होती है. 5 लोग मिलकर 15 से 20 दिन के अंदर प्रतिमा को रंग रोगन कर तैयार किया जाता है. इस साल गांव की 40 महिलाएं अन्य त्यागकर पूरे 10 दिनों तक मां की भक्ति में घर परिवार छोड़कर भक्ति में लीन रहती हैं. कहीं नहीं निकलती हैं. नवरात्र के अवसर पर आसपास के 10 किलोमीटर की दूरी पर पैदल चलकर शाम को श्रद्धालु दिया जलाने आती हैं
मंदिर की देखरेख वरूण कुमार वर्मा, दुलार देवी इत्यादि गांव के लोग रहकर करते हैं. भक्तों द्वारा लाखों रुपए मां को चढ़ावा देते हैं. जो मंदिर जीणोद्धार के काम आता है. नवादा के पड़रिया गांव निवासी बिरजू प्रसाद और उनकी पत्नी रीना देवी ने बताया कि माता रानी के आशीर्वाद से हमारे घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आई है.

“हम लोग गांव परिवार की ओर से बहुत सताए हुए हैं. अपना घर मकान भी नहीं था. पड़ोसी गांव वालों के द्वारा बताया गया कि रेवार में मां दुर्गा की पूजा होती है. उनके दर से आज तक कोई खाली नहीं लौटा है. उसी के कहने पर पूजा शुरू किए. आज सभी परिवार खुश हैं और अपना दो जगह घर नवादा और दिल्ली में बना चुके हैं.”- रीना देवी, श्रद्धालु
2007 में लगाया था नंबर: वहीं बिरजू बताते हैं कि उन्होंने 2007 में नंबर लगाया था. 18 साल बाद इस नवरात्र के मौके पर नंबर मिला है. हमलोग काफी हैं. खर्च के सवाल पर कहते हैं कि जितना भी खर्च होगा करेंगे. सब कुछ तो मां दुर्गा का ही दिया हुआ है.

“जब तक मैं जीवित हूं, मां दुर्गा की प्रतिमा बनवाकर यहां पूजा करते रहेंगे. हमारे 4 बच्चे हैं. सभी पढ़ाई करते हैं. दिल्ली में परिवार के साथ रहता हूं. टाइल्स मिस्त्री का काम करते हैं.”- बिरजू प्रसाद, श्रद्धालु

K k sanjay
Author: K k sanjay

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