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March 13, 2026 10:49 am

दरभंगा राज की अंतिम महारानी.. जिन्होंने भारत सरकार को 600 KG सोना किया था दान

दरभंगा राज की अंतिम महारानी.. जिन्होंने भारत सरकार को 600 KG सोना किया था दान

मिथिला की धरती से जुड़ा एक गौरवशाली अध्याय आज हमेशा के लिए इतिहास बन गया. दरभंगा राज परिवार की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का 94 साल की उम्र में 12 जनवरी 2026 को निधन हो गया. वह महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं.

महारानी कामसुंदरी देवी का निधन: दरभंगा राज की अंतिम महारानी, स्वर्गीय महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की धर्मपत्नी महारानी कामसुंदरी देवी का सोमवार प्रातः तीन बजे स्वर्गवास हो गया. उन्होंने अपने आवास ‘कल्याणी निवास’ में अंतिम सांस ली.
माधेश्वर परिसर में अंतिम संस्कार: उनका अंतिम संस्कार माधेश्वर परिसर में संपन्न हुआ. दिवंगत महारानी को मुखाग्नि उनके चचेरे पोता कुमार रत्नेश्वर सिंह के द्वारा दी गई. उनके अंतिम संस्कार में दरभंगा जिलाधिकारी कौशल कुमार, एसडीओ विकास कुमार, सदर डीएसपी राजीव कुमार सहित भारी संख्या में लोग मौजूद थे.

संविधान सभा सदस्य और पूर्व राज्यसभा सांसद: उनके निधन के बाद भी उन्हें अपेक्षित राजकीय सम्मान नहीं मिला, हालांकि उनके पति संविधान सभा के सदस्य और पूर्व राज्यसभा सांसद थे. कामसुंदरी देवी के निधन के साथ ही दरभंगा राजघराने की अंतिम कड़ी भी इतिहास में दर्ज हो गई है, जो अब केवल यादों का हिस्सा रह गई है.

महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी और अंतिम पत्नी: महारानी कामसुन्दरी का जन्म 22 अक्टूबर 1932 में मंगरौनी ग्राम में हुआ था और 94 वर्ष की आयु में सोमवार (12 जनवरी 2026) को उनका निधन हुआ. उनका विवाह महाराजा कामेश्वर सिंह के साथ 1940 के दशक में हुआ था. महाराजा कामेश्वर सिंह की पहली पत्नी महारानी राजलक्ष्मी और दूसरी पत्नी महारानी कामेश्वरी प्रिया पहले ही इस दुनिया से जा चुकी थीं.
महारानी कामसुंदरी दरभंगा राज घराने की अंतिम महारानी थीं. वे भले ही प्रत्यक्ष सत्ता में नहीं रहीं, लेकिन उन्होंने राजघराने की परंपराओं, संस्कारों और सामाजिक जिम्मेदारियों को पूरी गरिमा के साथ निभाया. राज दरभंगा के परिवार के सदस्य अजीत सिंह ठाकुर का कहना है कि महारानी काम सुंदरी का जीवन सादगी का प्रतीक माना जाता था.

“वे सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में सक्रिय भूमिका निभाती थीं और मिथिला की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत रखने में योगदान देती रहीं. उनका निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक धरोहर का अंत है.”- अजीत सिंह ठाकुर, सदस्य, दरभंगा राज

भारत सरकार को 600 KG सोना दान: महाराज दरभंगा के रिश्तेदार अजीत सिंह ठाकुर ने महारानी कामसुंदरी देवी से जुड़ी हुई बातों को साझा करते हुए कहा कि राजमाता काम सुंदरी देवी को देशभक्ति और त्याग के लिए विशेष रूप से याद किया जाएगा. भारत-चीन युद्ध के दौरान उन्होंने राष्ट्रहित में ऐतिहासिक कदम उठाते हुए भारत सरकार को 600 किलोग्राम सोना दान में दिया था.

“यह योगदान आज भी देश के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. दरभंगा राज की परंपरा को उन्होंने गरिमा और सेवा भाव के साथ आगे बढ़ाया. उनके निधन से एक युग का अंत हो गया.”-अजीत सिंह ठाकुर, रिश्तेदार, दरभंगा राज परिवार

एक भी संतान नहीं: संतान न होने के कारण महारानी कामसुंदरी देवी राज परिवार की सबसे वरिष्ठ सदस्य के रूप में जानी जाती थीं. महाराजा कामेश्वर सिंह का निधन 1962 में हुआ था, जिसके बाद महारानी ने राज परिवार की जिम्मेदारियों को संभाला और परंपराओं को जीवित रखने का प्रयास किया.

कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन की कहानी: महारानी कामसुंदरी देवी सामाजिक और परोपकारी कार्यों के लिए विख्यात थीं. उन्होंने अपने स्वर्गीय पति महाराजा कामेश्वर सिंह की स्मृति में महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन की स्थापना की थी. इसका उद्देश्य महाराजा की बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत को बचाना था. इसका मुख्यालय दरभंगा स्थित कल्याणी निवास है. इस फाउंडेशन की सबसे बड़ी उपलब्धि महाराजा का निजी पुस्तकालय है.

एक युग का अंत: प्रोफेसर अजय नाथ झा का कहना है कि महारानी कामसुंदरी के निधन के साथ दरभंगा राज की शाही परंपरा का अंतिम अध्याय समाप्त हो गया. दरभंगा राज्य की आखिरी पहचान के रूप में महारानी को देखा जाता था. महाराज दरभंगा और उनके पिताजी अपने ममेरे भाई थे. जब वह 4 वर्ष के थे तब महाराज कामेश्वर सिंह का निधन हुआ था. जिस समय दरभंगा एविएशन की स्थापना हुई थी, उनके पिताजी उसे कंपनी में मैनेजर थे.

“अपने पिताजी के मुंह से जब महाराज की कहानी सुनते थे तो गर्व होता है कि हम लोग उस परिवार का हिस्सा हैं. दरभंगा महाराज के परिवार के द्वारा बनाए गए मकान में दरभंगा विश्वविद्यालय कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय आज दरभंगा में एयरपोर्ट बना है. वह भी महाराज दरभंगा के द्वारा ही बनाया गया था.”- प्रो अजयनाथ झा, संबंधी राज परिवार
दरभंगा राज का इतिहास: दरभंगा राज का इतिहास लगभग सोलहवीं शताब्दी से शुरू होता है. मिथिला क्षेत्र में उस समय स्थानीय सामंतों और जमींदारों का प्रभाव था, लेकिन एक संगठित और शक्तिशाली राजवंश का उदय महाराज महेश ठाकुर के साथ हुआ. महाराज महेश ठाकुर दरभंगा राज का पहले शासक थे, जिन्हें 1557 ईस्वी में दिल्ली के मुगल सम्राट अकबर ने उनकी विद्वता से प्रभावित होकर मिथिला क्षेत्र का शासक नियुक्त किया था.

कहा जाता है कि महाराज महेश ठाकुर ने अकबर के दरबार में अपनी विद्वता और प्रशासनिक क्षमता से विशेष स्थान बनाया था. इसके बाद उन्हें मिथिला क्षेत्र की जिम्मेदारी सौंपी गई और यहीं से दरभंगा राज की नींव पड़ी.

दरभंगा राजधानी की वंशावली: खंडवला राजवंश का शासन मिथिला में 16वीं शताब्दी में शुरू हुआ. सबसे पहले शासन की शुरुआत का केंद्र भौंडागढ़ी हुआ करता था. बाद में वहां से उठकर दरभंगा में शिफ्ट हुआ. पहले शासन महाराज महेश ठाकुर और अंतिम शासक महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह हुए.
मिथिला के इतिहास नाम के पुस्तक में दरभंगा राज्य का पूरा वंशावली दिया गया है. सबसे पहले शासक महाराज महेश ठाकुर थे. उनके बाद महाराज हरिनारायण ठाकुर, महाराज पूर्णिया ठाकुर, महाराज कामेश्वर ठाकुर, महाराज महेंद्र ठाकुर (1556–1569), महाराज गोपाल ठाकुर (1569–1571), महाराज अनंत ठाकुर (1572–1573),महाराज शिवदेव ठाकुर (1573–1583), महाराज रुद्र ठाकुर (1583–1617) हुए.

उसके बाद महाराज पुरुषोत्तम ठाकुर (1617–1623), महाराज नारायण ठाकुर (1623–1641), महाराज सुंदर ठाकुर (1641–1667), महाराज महादेव ठाकुर (1667–1690),महाराज सुयश ठाकुर (1690–1701), महाराज राजा रघु सिंह (1701–1739), महाराज राजा विष्णु सिंह (1739–1743),महाराज राजा नरेंद्र सिंह (1743–1760) ने दरभंगा राज का जिम्मा संभाला.

फिर महाराज राजा प्रताप सिंह (1760–1775),महाराज राजा माधव सिंह (1775–1807), महाराज छत्र सिंह (1807–1839), महाराज रुद्र सिंह (1839–1850), महाराज महेश्वर सिंह (1850–1860), महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह (1880–1898), महाराजाधिराज रामेश्वर सिंह (1898–1929) ने महाराजा की गद्दी संभाली और महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह-(1929–1962) अंतिम राजा हुए.

प्रथम राजा महाराज महेश ठाकुर: महाराज महेश ठाकुर न केवल एक कुशल प्रशासक थे, बल्कि वे विद्वानों के संरक्षक भी माने जाते थे. उनके शासनकाल में मिथिला में शांति और स्थिरता आई. उन्होंने स्थानीय परंपराओं और संस्कृति को संरक्षित रखते हुए शासन किया.

महाराज महेश ठाकुर के समय से ही दरभंगा राज की पहचान एक ऐसे राज्य के रूप में बनने लगी, जहां विद्या और धर्म को विशेष सम्मान प्राप्त था. संस्कृत विद्वानों, पंडितों और आचार्यों को विशेष महत्व दिया जाता था. यही परंपरा आगे चलकर दरभंगा राज की सबसे बड़ी पहचान बनी.

मुगल काल से ब्रिटिश दौर तक: दरभंगा राज घराने के शासकों ने मुगल काल में दरभंगा राज ने अपनी स्वायत्तता बनाए रखी. हालांकि यह मुगल साम्राज्य के अधीन था, लेकिन आंतरिक प्रशासन में महाराजों को पूरी स्वतंत्रता प्राप्त थी. ब्रिटिश काल में दरभंगा राज एक बड़े जमींदारी क्षेत्र के रूप में उभरा.
अंग्रेजों के साथ समझौते के बाद दरभंगा राज ने अपने क्षेत्र और अधिकारों को सुरक्षित रखा. यही वजह रही कि ब्रिटिश शासन के दौरान भी दरभंगा राज आर्थिक रूप से बेहद समृद्ध रहा.

दरभंगा राज की प्रशासनिक व्यवस्था: दरभंगा राज की प्रशासनिक व्यवस्था अपने समय से काफी प्रभावी मानी जाती थी. दरभंगा राज के राजाओं के शासनकाल में यहां कर व्यवस्था, भूमि प्रबंधन, उद्योगों पर विशेष ध्यान और न्याय प्रणाली सुव्यवस्थित थी. धार्मिक संस्थानों को विशेष संरक्षण दिया जाता था. दरभंगा राज के शासक खुद को केवल राजा नहीं, बल्कि जनता का संरक्षक मानते थे.

शिक्षा और संस्कृति का केंद्र: दरभंगा राज का सबसे बड़ा योगदान शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में रहा. मिथिला को विद्या की भूमि कहा जाता है और इसमें दरभंगा राज की भूमिका अहम रही. संस्कृत शिक्षा के लिए दरभंगा राज द्वारा कई पाठशालाओं और विद्यापीठों की स्थापना की गई.

आगे चलकर यही परंपरा दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के रूप में सामने आई. संगीत, साहित्य और कला पर विशेष ध्यान दिया जाता था. मैथिली भाषा और साहित्य के विकास में दरभंगा राज का योगदान अतुलनीय माना जाता है.

अंतिम राजा महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह : दरभंगा राज के इतिहास में महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाता है. वे न केवल दरभंगा राज के अंतिम शासक थे, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के दौर में एक प्रभावशाली व्यक्तित्व भी थे. महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह आधुनिक शिक्षा से जुड़े हुए थे और उन्होंने अपने राज्य में कई सुधार किए.

विश्वविद्यालयों की निर्माण में अहम योगदान: स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने कई बार देशहित में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. देश के कई प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों के निर्माण में महाराज दरभंगा में महत्वपूर्ण योगदान दिया. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय के निर्माण में उन्होंने सबसे ज्यादा योगदान दिया.

दरभंगा एविएशन की शुरुआत: महाराज दरभंगा के द्वारा देश का पहला प्राइवेट एयरलाइंस कंपनी “दरभंगा एविएशन” शुरू किया गया. इसके अलावा औद्योगिक क्रांति में भी हमारा दरभंगा का विशेष योगदान रहा. चीनी मिल सुता फैक्ट्री पेपर मिल सहित कई बड़े उद्योगों की स्थापना महाराज दरभंगा के शासन काल में हुआ.

मैथिली साहित्य को बढ़ावा: महाराजा कामेश्वर सिंह के समय में आर्यावर्त और इंडियन एक्सप्रेस नाम से अखबार भी निकाली गयी. मैथिली साहित्य को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने मिथिला मिहिर नाम से पत्रिका भी प्रकाशन शुरू करवाया था जो बहुत दिनों तक चलता रहा.

आजादी के बाद दरभंगा राज का विलय: देश की आजादी के बाद रियासतों का विलय हुआ. दरभंगा राज भी भारतीय गणराज्य का हिस्सा बन गया. इसके साथ ही राजशाही व्यवस्था समाप्त हो गई, लेकिन दरभंगा राज का सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव बना रहा. राजघराने ने राजनीति और सामाजिक कार्यों के जरिए अपनी भूमिका निभाई. शिक्षा, स्वास्थ्य और समाजसेवा के क्षेत्र में दरभंगा राज परिवार का योगदान जारी रहा.

मिथिला के इतिहास में वर्णन: मिथिला के इतिहास नाम की पुस्तक के लेखक और महाराज दरभंगा राज परिवार के सदस्य शक्ति नाथ सिंह ठाकुर के द्वारा लिखी किताब के 163 नंबर पेज में यह लिखा गया है कि भूदान आंदोलन के समय महाराज दरभंगा से गरीबों के लिए जमीन दान करने का आग्रह किया गया. विनोबा भावे के आग्रह पर महाराज दरभंगा ने 1 लाख 15000 एकड़ जमीन दान में दिया गया.

अस्पताल का निर्माण: गरीबों के लिए उनके मन में विशेष लगाव था, इसीलिए उन्होंने दरभंगा में कामेश्वरी प्रिया पुअर होम नाम से एक अस्पताल का निर्माण करवाया, जिसमें उस समय न केवल मिथिला के बल्कि बिहार के बाहर के भी लोग मुफ्त में इलाज करवाने के लिए यहां आते थे. दरभंगा राज का प्रभाव केवल मिथिला तक सीमित नहीं था.
दरभंगा राज की लोकप्रियता: दरभंगा राज के पारिवारिक सदस्य रहे तेजकर झा ने बताया कि दरभंगा राज के समय में औद्योगिक क्रांति पर विशेष ध्यान दिया गया. महाराजा रामेश्वर सिंह के समय में अनेक चीनी मिल और जूट मिल खोले गए.

रेलवे का विस्तारीकरण: 18वीं शताब्दी में रेलवे का विस्तारीकरण तत्कालीन महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह के समय में दरभंगा तक किया गया. समस्तीपुर से दरभंगा के छात्र निवास पैलेस जो बाद में नरगोना पैलेस के नाम से जाना गया, तक रेलवे लाइन बिछाया गया था. अपने पिता महाराजा रामेश्वर सिंह और चाचा महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह के विरासत को महाराजा कामेश्वर सिंह ने और ऊंचाई दी.

विदेशों तक में डंका: देश ही नहीं विदेशों में भी प्रमुख जगह पर दरभंगा राज के द्वारा दरभंगा हाउस नाम से आलीशान महल बनाए गए. दिल्ली, कोलकाता, पटना, बनारस, इलाहाबाद सहित विदेशों में भी दरभंगा हाउस वह सिंबल बना जिसे देखते ही लोग समझ जाते थे कि इसका निर्माण महाराज दरभंगा ने करवाया होगा.

“वर्तमान की सरकार स्टार्टअप पर जोर दे रही है, लेकिन महाराज कामेश्वर सिंह कितने दूरदर्शी थे कि उस समय उन्होंने दरभंगा इन्वेस्टमेंट नाम से एक प्रोजेक्ट लाया था. इस प्रोजेक्ट में कोई भी छोटे-छोटे उद्योगपति जो नया कॉन्सेप्ट के साथ उद्योग स्थापित करना चाहते थे, उन्हें महाराज की तरफ से विशेष सहयोग दिया जाता था.”- तेजकर झा, सदस्य, दरभंगा राज परिवार

परिवार में कौन कौन हैं?: महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह को कोई संतान नहीं था, लेकिन उनके छोटे भाई बाबू विश्वेश्वर सिंह को तीन पुत्र हुए. कुमार जिवेशवर सिंह, कुमार योगेश्वर सिंह और कुमार सुभेश्वर सिंह. कुमार योगेश्वर सिंह के एक पुत्र हुए कुमार रत्नेश्वर सिंह और जिवेशवर सिंह के दो पुत्र हुए कुमार राजेश्वर सिंह और कुमार कपिलेश्वर सिंह. दरभंगा राज की विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेवारी वर्तमान में इन्हीं तीनों के ऊपर है.

K k sanjay
Author: K k sanjay

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