पांचवें दिन भी कोई अपना नहीं आया, तो अजनबी बनी ‘मंजू’ ने दी पूनम को मुखाग्नि
समस्तीपुर में रिश्तों की बेरुखी के बीच जिंदा रही इंसानियत
समस्तीपुर।
रिश्तों के शहर में जब अपने ही मुंह फेर लें, तब कभी-कभी इंसानियत किसी अजनबी के हाथों से उजागर होती है। सदर अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस में चार दिनों तक पड़ी एक महिला की देह सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि समाज, रिश्तों और व्यवस्था की संवेदनहीनता का मूक दस्तावेज बन चुकी थी। अंततः रविवार को पांचवें दिन अस्पताल प्रबंधन ने उसे अज्ञात मानते हुए अंतिम संस्कार कर दिया।
विडंबना यह रही कि जिस मां ने बेटे को जन्म दिया, उसी मां की चिता को आग देने के लिए न पति, न कोई परिजन।बेटा तो पांच दिनों तक शव के आगे बैठकर अनाथ बना रहा नाबालिग ।अंततः यह फर्ज निभाया पोस्टमार्टम हाउस में कार्यरत महिला कर्मचारी मंजू ने—बिना किसी रिश्ते के, सिर्फ इंसानियत के नाते।
मृतका की पहचान अंगारघाट थाना क्षेत्र के अंगार गांव निवासी शैलेश पासवान की पत्नी पूनम कुमारी के रूप में हुई थी। मंगलवार की सुबह नगर थाना क्षेत्र के बारह पत्थर मोहल्ले में किराये के मकान से उसका शव संदिग्ध हालत में बरामद किया गया था। पुलिस ने उसी दिन शव को पोस्टमार्टम के लिए सदर अस्पताल भेजते हुए ससुराल पक्ष को सूचना दी थी।
लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह रिश्तों की बेरुखी की सबसे कड़वी तस्वीर बन गया।
चार दिन बीत गए—न पति आया, न ससुराल का कोई सदस्य। बताया जाता है कि पति पहले ही पूनम को छोड़ चुका था और अपनी अलग दुनिया बसा चुका है, जबकि ससुराल पक्ष ने शव लेने से साफ इनकार कर दिया।
इसी बीच पूनम का दस वर्षीय बेटा पंकज अचानक अनाथ हो गया। जिस मां के आंचल में उसने आंखें खोली थीं, उसी मां के अंतिम संस्कार से वह अनजान रहा। मासूम अब मकान मालिक के पास है और पुलिस उसे चाइल्ड लाइन को सौंपने की प्रक्रिया में जुटी हुई है।
नगर थानाध्यक्ष अजीत कुमार के अनुसार परिजनों से लगातार संपर्क की कोशिश की गई, लेकिन कोई आगे नहीं आया। नियमानुसार 72 घंटे बीत जाने के बाद प्रशासन ने अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाई।
जब चिता सजी और मुखाग्नि का समय आया, तो वहां कोई अपना मौजूद नहीं था। तब पोस्टमार्टम कर्मी मंजू आगे बढ़ीं और उस मां की चिता को आग दी, जिसकी जिंदगी और मौत—दोनों में रिश्तों ने साथ छोड़ दिया था।
पूनम जीवन में पत्नी, बहू और मां थी, लेकिन अंतिम यात्रा में वह सिर्फ एक सरकारी फाइल बनकर रह गई। फिर भी उसकी चिता को आग देने वाला वह हाथ यह बता गया कि
संवेदना अब भी जिंदा है—भले ही रिश्ते मर चुके हों।






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