*होमियोपैथ का चमत्कारी चिकित्सा विज्ञान के जनक हैनिमैन : डॉ. आर. के. यादव*
समस्तीपुर। हसनपुर क्षेत्र के मशहूर होमियोपैथ चिकित्सक डॉ. आर. के. यादव ने होमियोपैथी के जनक हैनिमैन जयंती दिवस पर बताया कि विज्ञान और चमत्कार दोनों एक सिक्के के दो पहलू मात्र हैं। जिन हिस्सों का ज्ञान होता है, उसे विज्ञान और जिन हिस्सों को हम नहीं जानते, उसे चमत्कार समझते हैं। विज्ञान द्वारा स्थापित कुछ सिद्धांतो में सामयिक परिवर्तन होता रहता है,जो हमारे क्रमागत ज्ञान का हिस्सा है। प्रकृति के नियम और सिद्धांत स्थाई होते हैं,जिसके बहुत हीं कम हिस्सों को विज्ञान अब तक जान पायी है, परन्तु उसके बहुत बड़े हिस्सो का प्रभाव और अनुभव जो दिख रहा है,वही हमारे लिए विस्मय और चमत्कार जैसा है। होमियोपैथी चिकित्सा विज्ञान कि बात जिस समय कही गई थी उस समय एटमीक इनर्जी, चुम्बकीय सिद्धांत, जेनेटिक जैव विविधता ,जैव शक्ति सिद्धांत, रोगी और रोग क्या है,कार्य और कारण (काॅज एण्ड इफेक्ट्स) जैसे सिद्धांतो का कोई वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं हो पाया था। यद्यपि होमियोपैथी का आधार इन्हीं सिद्धांतों पर खड़ा हुआ। तत्कालीन चिकित्सा इसके विपरीत और अवैज्ञानिक था, तब होमियोपैथ का बहुत बड़ा विरोध हुआ। होमियोपैथी महज़ एक विश्वास और धोखा मात्र है जैसे भ्रम को भी फैलाया गया, जो इसके चिकित्सकीय फायदे से प्रभावित हुए वो इसके वैज्ञानिकता से अनजान थे, उनके लिए भी यह चिकित्सा एक चमत्कार हीं लगा। महान जैव वैज्ञानिक जर्मन फ्रेडरिक डॉ सैमुएल हैनिमैन के द्वारा होमियोपैथी चिकित्सा का आविष्कार दो सौ तीस वर्ष (1796) पूर्व हुआ। जो प्रकृति के अकाट्य सिद्धांत, सिमिलिया सिमिलीबस क्योरेंटर अर्थात समान से समान का नाश (शमः शमम् शमयति) पर आधारित एक मात्र चमत्कारी चिकित्सा विज्ञान है। होमियोपैथी औषधियों में भौतिक गुणों कि जगह एटमी शक्ति और चुम्बकीय गुण मौजूद होता है। समान ध्रुवों के बीच विकर्षण जैसे चुम्बकीय सिद्धांत कि तरह रोगी के सम्पूर्ण लक्षणों में उसके हीं समरुप गुणों वाले आण्विक शक्ति से युक्त दिव्यौषधि का प्रयोग किया जाता है और रोगी अपने सम्पूर्ण रोगों से मुक्त हो जाता है अर्थात समान से समान का नाश। यह विषष्य विषमौषधम (विष से विष का नाश) जैसे सिद्धांत को भी सिद्ध करता है। औषधिय पदार्थ का स्थुल मात्रा में स्वस्थ व्यक्ति को बार-बार देने से मानसिक एवं शारीरिक लक्षण जो भी प्रकट होता है उसमें उसी औषधिय पदार्थ के शुक्ष्म शक्तिकृत मात्रा जब उस व्यक्ति को दिया जाता है तो वह सभी लक्षण गायब हो जाता है।जो एक अद्भुत जैव शक्ति सिद्धांत के अनुरूप है।अपनी विशिष्ट और अकाट्य वैज्ञानिकता के कारण होमियोपैथी चिकित्सा, अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से यात्रा करते हुए आज एक्कीसवीं शताब्दी के इस वैज्ञानिक युग में वर्तमान और भविष्य कि एक मात्र चिकित्सा विज्ञान सावित हो रहा है। विज्ञान स्वयं में एक चमत्कार है तो होमियोपैथी विज्ञान और चमत्कार दोनों है।आण्विक शक्ति, जैव शक्ति और क्वांटम सिद्धांत ने विज्ञान के लिए एक असिम ब्रह्माण्ड का द्वार खोल दिया है। वहीं अब होमियोपैथी चिकित्सा के विज्ञान को समझना भी आसान हो गया है। हर छोटी-बड़ी आसाध्य कही जाने वाली बीमारियों से लेकर बड़ी से बड़ी महामारियों में होमियोपैथी अपनी उपयोगिता सिद्ध कर रहा है। हालिया कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी में वायरस के बदलते स्वरूप में किसी भी बाहरी प्रतिरोधी दवाओं या चिकित्सा को सोचने पर मजबूर कर दिया, उल्टे साधारण सफ़ेद और काले फंगस का प्रभाव मौतों में बदलनें लगा। एक प्रतिष्ठित पत्रिका “द लांसेट” कि हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि एण्टिवायोटिक प्रतिरोधी वैक्ट्रिया (सुपर बग इन्फेक्शन) से भारत सहित दुनिया के कई देशों में प्रतिवर्ष लाखों लोगों कि मृत्यु हो रही है जो सन् 2050 तक इसके आंकड़े करोड़ों में हो जाएगी। इसका कारण भी अनियंत्रित एण्टिवायोटिक के प्रयोग का होना बताया जा रहा है। यहां तक कि प्रचलित चिकित्सा व्यवस्था के दशा और दिशा हिनता के कारण, इस वैज्ञानिक युग में भी चिकित्सकीय अंधविश्वास का बहुत बड़ा व्यापार फैला हुआ है। तथाकथित भूत-प्रेत, डायन-जोगिन, जादू-टोना, और टोटका जैसे भ्रामक बीमारियों का सफल इलाज देने में सक्षम नहीं है। यद्यपि तत्कालीन मृत्यु दरों में कमी लाने का श्रेय इसे अवश्य प्राप्त है लेकिन भविष्य सुरक्षित नहीं दिख रहा है।मानव जब कभी भी किसी संकट में आया है तो विज्ञान ने उसे आगे का मार्ग दिखाया है। होमियोपैथी चिकित्सा विज्ञान कि चमत्कारी शक्ति, इन सभी समस्याओं के लिए एक बेहतर विकल्प है।






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