Explore

Search

May 5, 2026 11:28 pm

Samastipur Holi 2026: भिरहा बना ‘बिहार का वृंदावन’, होली पोखर में घुलते हैं रंग और परंपरा

Samastipur Holi 2026: भिरहा बना ‘बिहार का वृंदावन’, होली पोखर में घुलते हैं रंग और परंपरा

 

समस्तीपुर का भिरहा बना “बिहार का वृंदावन”, होली पोखर में घुलते हैं रंग और परंपरा

बिहार के Samastipur जिले के रोसड़ा प्रखंड अंतर्गत स्थित भिरहा गांव अपनी अनोखी होली के लिए पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध है। यहां होली का उत्सव ब्रज की परंपरा पर मनाया जाता है, जिस कारण इसे “बिहार का वृंदावन” कहा जाता है। राष्ट्रकवि Ramdhari Singh Dinkar ने भी भिरहा की होली देखकर इसे “बिहार का वृंदावन” की संज्ञा दी थी।
ब्रज शैली की ऐतिहासिक परंपरा
ग्रामीणों के अनुसार, कई दशक पहले गांव के कुछ लोगों ने ब्रज में मनाई जाने वाली होली देखी और उसी तर्ज पर भिरहा में इस परंपरा की शुरुआत की। कुछ स्रोत इसकी शुरुआत वर्ष 1932 से बताते हैं, जबकि कुछ इसे 1836 से जुड़ा मानते हैं। ग्रामीण राजीव कुमार चौधरी बताते हैं कि “साल 1932 से यहां तीन दिनों तक ब्रज जैसी परंपरा के साथ होली मनाई जा रही है।”
तीन दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव में पश्चिम, उत्तर और पूर्व टोलों के बीच गीत-संगीत और रंगों की प्रतियोगिता होती है। इस दौरान राजस्थान, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों से बैंड पार्टियां और कलाकार भी बुलाए जाते हैं।

होली पोखर: उत्सव का मुख्य केंद्र
भिरहा गांव के मध्य स्थित ‘होली पोखर’ इस उत्सव का सबसे प्रमुख आकर्षण है। यहां रंग बाल्टी या लोटों में नहीं, बल्कि पोखर में घोला जाता है। होली के दिन टोलों के बीच गीत-संगीत के साथ रंगों की जमकर होड़ होती है। लोग पोखर में घुले रंग को एक-दूसरे पर छिड़कते हैं, जिससे पूरा गांव रंगों में सराबोर हो जाता है।

इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए बिहार के विभिन्न जिलों के साथ-साथ अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। आयोजनकर्ता इसे बदलते समय में भी पुरानी संस्कृति को जीवित रखने का माध्यम मानते हैं।
साल भर चलती है तैयारी

भिरहा के पुरवरिया, पश्चिम, उत्तर और पूरब टोलों के लोग साल भर इस उत्सव की तैयारी में जुटे रहते हैं। होली से कई दिन पहले पोखर के आसपास सफाई, सजावट और भव्य पंडालों का निर्माण शुरू हो जाता है। आकर्षक लाइटिंग से पूरा गांव जगमगा उठता है। लोकगीत, नृत्य और संगीत की प्रस्तुतियों में बेहतर प्रदर्शन को लेकर टोलों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती है।

देश-विदेश से लौटते हैं ग्रामीण
यह उत्सव इतना लोकप्रिय है कि भिरहा और आसपास के गांवों के लोग, चाहे वे देश या दुनिया के किसी भी कोने में हों, होली पर अपने गांव लौट आते हैं। रिश्तेदार दूर-दराज के शहरों से पहुंचते हैं। इस दौरान गांव में जाति-धर्म की दीवारें मिट जाती हैं और सभी मिल-जुलकर उत्सव मनाते हैं। यह आयोजन सामाजिक एकता और भाईचारे का प्रतीक बन चुका है।

संस्कृति को संजोने का प्रयास
आयोजन समिति के सदस्य बताते हैं कि बुजुर्गों की देखरेख में नई पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियां, बैंड और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस उत्सव को और भी आकर्षक बनाते हैं।
बिहार की सांस्कृतिक धरोहर

भिरहा की होली केवल मिथिलांचल ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। यहां रंगों के साथ भावनाएं भी उमड़ती हैं। यह उत्सव साबित करता है कि परंपराएं समय के साथ और भी जीवंत हो सकती हैं। होली पर भिरहा पहुंचकर हर कोई ब्रज की छटा का अनुभव करता है, जहां रंग सिर्फ रंग नहीं, बल्कि खुशियों और एकता का प्रतीक बन जाते हैं।

K k sanjay
Author: K k sanjay

Leave a Comment

विज्ञापन
लाइव क्रिकेट स्कोर
error: Content is protected !!