बिहार में एलपीजी व पेट्रोल-डीजल संकट गहराया, आम लोगों की बढ़ी परेशानी
बिहार में इन दिनों एलपीजी गैस की कमी और पेट्रोल-डीजल संकट ने आम लोगों की कमर तोड़ दी है। जहां एक ओर हर परिवार को मिलने वाला एलपीजी सिलेंडर औसतन 22 दिनों में ही खत्म हो जा रहा है, वहीं सरकार द्वारा 45 दिनों में डिलीवरी देने के निर्देश के कारण लोगों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
इस गंभीर स्थिति में अब लोगों को खाना पकाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था अपनानी पड़ रही है। मजबूरी में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लोग फिर से लकड़ी और जलावन पर निर्भर हो रहे हैं। लेकिन यहां भी राहत नहीं है—जलावन और नेरहा की कीमतें आसमान छू रही हैं। जो नेरहा एक महीने पहले 400–500 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा था, वह अब 1200 रुपये तक पहुंच गया है। वहीं जलावन की कीमत 700 रुपये से बढ़कर 1000 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है।
स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि कई जगहों पर गैस सिलेंडर की कालाबाजारी भी शुरू हो गई है, जहां एक सिलेंडर 3000 से 3500 रुपये में बेचा जा रहा है।जिसे दुकानदार लोग खरीद रहा है इसका असर अब खाने-पीने की चीजों पर भी दिखने लगा है—चाय जो पहले 5 रुपये में मिलती थी, अब 10 रुपये हो गई है। लिट्टी-समोसा 6–7 रुपये से बढ़कर 10 रुपये प्रति पीस और रसगुल्ला 200 रुपये किलो से बढ़कर 280 रुपये किलो तक पहुंच गया है।
इसी बीच पेट्रोल-डीजल की कमी के कारण लोग घबराकर स्टॉक करने लगे हैं। पहले जहां लोग 50 रुपये का पेट्रोल लेते थे, अब टंकी फुल कराने के साथ-साथ जर्किन और गैलन में भी स्टोर कर रहे हैं। इससे पेट्रोल पंपों पर भीड़ और अव्यवस्था बढ़ गई है। कुछ जगहों पर पेट्रोल 150 रुपये प्रति लीटर तक ब्लैक में बिकने की खबरें सामने आ रही हैं।
बताया जा रहा है कि गोपालगंज जिले में जिलाधिकारी ने 90 पेट्रोल पंपों पर मजिस्ट्रेट की तैनाती कर कालाबाजारी पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया है। वहीं समस्तीपुर में भी ऐसी पहल की जरूरत महसूस की जा रही है।
निष्कर्ष:
अगर समय रहते प्रशासन और सरकार ने इस संकट पर नियंत्रण नहीं किया, तो यह स्थिति और भयावह रूप ले सकती है। आम जनता के साथ-साथ सरकारी कर्मचारियों को भी दैनिक कार्यों में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए त्वरित कार्रवाई और सख्त निगरानी अब बेहद जरूरी हो गई है।






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