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September 14, 2026 12:06 am

सुराना गांव में सैंकड़ों वर्ष से रक्षाबंधन का त्योहार नहीं मनाया जाता है

सुराना गांव में सैंकड़ों वर्ष से रक्षाबंधन का त्योहार नहीं मनाया जाता है

गाजियाबाद: कल जब करोड़ों लोग अपने रक्त और धर्म संबंधी भाई- बहनों के साथ रक्षाबंधन का स्नेहपर्व मनाएंगे, तब मुरादनगर क्षेत्र के सुराना गांव में भाइयो की कलाई सूनी रह जाएंगी। इस गांव में रक्षाबंधन के त्यौहार को अपशकुन से जोड़कर देखा जाता है।

दिल्ली मेरठ मार्ग से 14 किलोमीटर दूर हरनंदी नदी के किनारे स्थित सुराना गांव में सैंकड़ों वर्ष से रक्षाबंधन का त्योहार नहीं मनाया जाता है, बल्कि यहां के लोग रक्षाबंधन मनाने के स्थान पर इस दिन गांव के लोग सदियों पहले हुए एक नरसंहार का शोक मनाते हैं, जिसकी कड़वीं यादें और उनसे जुड़ी कहानियां लोगों के मानस आज भी जिंदा है।

लोगों का कहना है कि सुराना गांव में रक्षाबंधन मनाने का रिवाज नही रहा है। पूर्व में कई कुछ लोगों ने रक्षाबंधन मनाने का प्रयास भी किया तो गांव में अशुभ घटनाएं होनी शुरू हो गई।

सुराना गांव मूलरूप से छबड़िया गोत्र यदुवशी अहीरों द्वारा बसाया हुआ बताया जाता है। जो कि सन 1106 के आसपास राजस्थान के अलवर से हरनंद के तट पर आ बसे थे। शौर्यवान जाति होने के चलते सौ और रण शब्द जोड़कर गांव नाम सौराणा रखा गया जो कालांतर में सुराना हो गया।

1192 में तराईन के द्वितीय युद्ध में मोहम्मद के हाथों पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद उनकी सेना बचे हुई अहीर यादव सिपाहियों की टुकड़ी ने सुराना गांव में शरण ली थी। उक्त टुकड़ी की पीछा करते हुए गौरी अपनी पचास हजार की सेना के साथ सुराना गांव पहुंचा और पूरे गांव को घेर लिया। गौरी ने सिपाहियों को हवाले करने या युद्ध करने की धमकी दी थी।

आन पर जान लुटाने वाले यदुवशियों ने शरणागत सिपाहियों को हवाले करने से इंकार कर दिया। जिसके परिणामस्वरूप रक्षाबंधन के दिन अपनी बहनों से राखी बंधवाकर केसरी बाना पहनकर यदुवशी यौद्धा गौरी की विशाल सेना के सामने जा डटे।

हजारों की सेना के सामने सैंकड़ों यदुवंशियों ने लड़ते हुए अपनी कुर्बानी दी। बाद में गौरी के आदेश पर गांव के बचे हुए वृद्धों महिलाओं व बच्चों का नृशंस नरसंहार कर दिया था।

सैकड़ों वर्ष पहले आए उस खूनी रक्षाबंधन की याद आज भी लोगों के जहन में हैं और यहां के लोग अपने पूर्वजों के साथ नरसंहार के शोकस्वरूप गांव में रक्षाबंधन का त्यौहार नहीं मनाते हैं और सुराना गांव में रक्षाबंधन को शोक दिवस के तौर पर मनाया जाता है।

K k sanjay
Author: K k sanjay

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